भाव – प्रियंका ‘अलका’

 एक कागज उजलीएक स्याही नीलीएक मन का कुँआरंगों से भरा है ।दृगो का काजलजो चमक रहा है,दबा भाव भीदहक रहा है । ।नियमों का फंदाकई रंगों में डूबाखींच-खींच मुझेजो रोक रहा है ,सही-गलत के भेदों परबार-बार मुझे जोटोक रहा है,टूट रहा है……..हाँ टूट रहा है,पलकों में बंधेभावों का सब्रअब टूट रहा है ।अब कलम चलेगादबा भावकागज पे बहेगा,रोके न रूकेगा,छिपाये न छिपेगा,क्या थोड़ाऔर क्या ज्यादाहर एक भावअब तोलेगा,हर एक भावअब बोलेगा।।-अलका

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10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/03/2017
    • ALKA ALKA 22/03/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/03/2017
    • ALKA ALKA 22/03/2017
  3. C.M. Sharma babucm 21/03/2017
    • ALKA ALKA 22/03/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/03/2017
    • ALKA ALKA 22/03/2017
  5. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 23/03/2017
  6. ALKA ALKA 23/03/2017

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