कभी ना कभी..

कभी ना कभी तो वो मंजिल मिलेगी,जिसकी रहती है हमको हसरत | पर अबके परिवेश को देख, है ये चिंतनकि कमोबेश हर मुक़ाम धरोहर बन गई है-उनकी, जिनकी लालसाएं है बेगैरतऔर जिनके साथ है भ्रष्टतंत्र हरदम |जानता हूँ, शायद हैरान होंगे आप,पर जरा रूबरू होने का कष्ट तो उठाएं,भुक्तभोगियों की दास्तान पे गौर तो फरमाएं,सौ आने सच मिलेगा, फिर भी गर कुछ बचेतो मान लेना रह़म ऊपर वाले का,जहाँ कलियुग में कभी कभार बस यूँ ही हो जाती है उसके वर्चस्व की भी अनुशंसा ||राकेश

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6 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 21/03/2017
    • राकेश पांडेय 21/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/03/2017
    • राकेश पांडेय 21/03/2017
  3. Kajalsoni 21/03/2017
    • राकेश पांडेय 21/03/2017

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