दो मुक्तक – अजय कुमार मल्लाह

समझ में कुछ नहीं आता समझदारी भी ऐसी है, उसके एहसान से ज़िन्दा हूँ खुद्दारी भी ऐसी है, मेरा ये रोग मुझको तो लाइलाज लगता है, दवा करती नहीं असर, ये बीमारी भी ऐसी है।दिल की बात समझने का उसे हुनर नहीं आता, समझता हूँ बखूबी मै कि किस कदर नहीं आता, मेरे जज़्बात उसको मैं भला अब कैसे समझाऊँ, आइने में भी वो दिखती है, मै नज़र नहीं आता।

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12 Comments

  1. babucm 17/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" 18/03/2017
  3. Madhu tiwari 18/03/2017
  4. sumit jain 18/03/2017
  5. डी. के. निवातिया 18/03/2017
  6. Kajalsoni 20/03/2017

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