प्रेम का अंकुर – शिशिर मधुकर

मैं अजनबी लोगों के साथ घर में रहता हूँ बोझिल हुए रिश्तों के सारे बोझ सहता हूँ हर अंग चोटिल है मेरा अपनों के तीरों सेदिल की पीर मैं ना मगर सब से कहता हूँ सुनने में ये किस्सा तो बड़ा आम लगता हैइस संसार में इंसान एक दूजे को ठगता है सब लोग इस जहान में हैं स्वार्थ के साथीप्रेम का अंकुर बस कुछ दिलों में उगता है शिशिर मधुकर

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12 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 15/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 15/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 15/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017
  4. Kajalsoni 15/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017
  5. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 15/03/2017
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017
  7. Lucky 15/03/2017
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/03/2017

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