सहमी दुनिया

कभी देख अपनी काबिल आँखों से ,सहमी इस दुनिया का सलीका |बन्दूक ताने लोकतंत्र की बातें करते ,जालसाजी लोगों का तरीका | नफरत का आलम इस कदर हैकि अमन की राह भी अब तो बन्दूक की नाली से होकर गुज़रती है|और जो बाशिंदे भेजे थे मोहब्बत के आशियाँ बनानेवो दायरों में सिमट ,मानवता की शहादत पे नफरत के घरोंदे बनाते जान पड़ते हैं|सुन कभी वहशीपन की वो चीखें ,हकीक़त की चितकी लपटों के साथ सुलगती दुनिया की सलीका |अमन के पैगाम की बात करने वाला ,आज सरहदों के नाके मोड़ता जान पड़ता है|जन्नत जहन्नुम का उपदेश देने वाला ,लोगों की कब्र का दायरा तय करता दिखाई पड़ता है|गिद्धों के इस बाज़ार में दुकाने सबके ईमान की सजी, कभी बिका तो कभी ख़रीदा गयासौदा सब के ईमान का हुआ इस धर्मं के कारोबार में |दहशत भरे इस मंज़र में सच लहूलुहान जान पड़ता है |अपनी ही रूह का कत्ल कर,इंसानियत का वो फ़रिश्ता ,आज मातम मनाता सुनाई पड़ता है|

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4 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 14/03/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 14/03/2017
  3. C.M. Sharma babucm 14/03/2017
  4. Kajalsoni 16/03/2017

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