चलो आज फिर दिल को मनाया जावे

चलो आज फिर दिल को मनाया जावेयादों की  किश्ती को  सजाया  जावे। यूँ  नंगे बदन  कब तक  चलोगे, यारोंचलो फिर किसी का कफन चुराया जावे। इस शहर को और भी सजाया जायेहर लाश को चौक पे  बिठाया जाये। यह गुजरात है यहाँ क्या किया जायेमैकदा  अब घर को ही बनाया जाये। जला दिया जाता है हर घोंसला यहाँक्यूँ  न इस चमन को जलाया जाये। पढ़कर गजल बहुत जो रोना आ गयाक्यूँ  ना  इसे अश्क से  मिटाया जाये। पर- शिकस्ता हूँ  यह जान लो,  हवाओंअब सोचो कि मुझे किधर उड़ाया जाये। माना कि  मेरी कलम  सूरते-शमशीर हैचलो पढ़ना किसी इक को सिखाया जाये। चलो इस शहर को फिर से जगाया जायेकल का  अखबार  फिर बिकवाया जाये। जिस दरो-दीवार पे खामोशी लिखी हैअच्छा हो  उसे ही  खटखटाया जाये। पाजेब की खामोशी कब तक सुनोगेजंजीर की आवाज को जगाया जाये। इधर जिस्म के  जलने की  बू आती हैचलो, दहेज इसी शहर में जलाया जाये।—-      भूपेंद्र कुमार दवे00000 

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6 Comments

  1. Krishan saini कृष्ण सैनी 11/03/2017
    • bhupendradave 11/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 12/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 12/03/2017
  4. Kajalsoni 13/03/2017

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