इजाज़त चाहता हूँ – अजय कुमार मल्लाह

अब पीता हूँ शराब मै हो गया हूँ खराब,कुछ सवाल हैं ज़हन में जिनके ना मिले जवाब,कोई आए तो सही, करना शिकायत चाहता हूँ,इस जहां को छोड़ जाने की, इजाज़त चाहता हूँ।मुनासिब समझता हूँ रोक लेना इन कदमों को,कि फिर नहीं रोक पाऊंगा दिल पे लगते सदमों को,लाश बनने की तमन्ना है, अब क़यामत चाहता हूँ,इस जहां को छोड़ जाने की, इजाज़त चाहता हूँ।मैं बदनसीब हूँ कितना कि उसको पा नहीं सकता,तवज्जो देता हूँ इसलिए कि उसे भूला नहीं सकता,मुझपर हो ना अब इश्क़ की, इनायत चाहता हूँ,इस जहां को छोड़ जाने की, इजाज़त चाहता हूँ।सबका मानना है दिल तोड़ना कोई गुनाह नहीं होता,किसी के रूठ जाने से कोई तबाह नहीं होता,बदल जाए ज़माने की, ये रिवायत चाहता हूँ,इस जहां को छोड़ जाने की, इजाज़त चाहता हूँ।

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8 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 11/03/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/03/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/03/2017
  4. Kajalsoni 11/03/2017

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