दम तोड़ती इंसानियत – अनु महेश्वरी

 कहने को छू आए चाँद हम,पर पड़ोसियों से रहें अंजान हम।बढ़ रही आबादी के साथ यहाँ,आज किसी के पास फुर्सत कहाँ?आज दम तोड़ रही इंसानियत यहाँ।पूरी करने अपनी ख्वाइशें,इधर उधर सब दौड़ रहे।इकठ्ठा किया मनोरंजन का सामान,पर खोया मन का चैन कहाँ?आज दम तोड़ रही इंसानियत यहाँ।वो भी क्या जमाना था,पूरा मुहल्ला अपना था।हम, आज एक ही घर में,दूर दूर है, साथ रहते हुए भी यहाँ,आज दम तोड़ रही इंसानियत यहाँ।दोस्ती फेसबुक पे सिमटने लगी,शाम बिताने को सच्चा दोस्त नहीं।रिश्तो से मासूमियत अब खोने लगी कही,न ही अपनापन है और न ही भावनाएं रही यहाँ,आज दम तोड़ रही इंसानियत यहाँ|भेड़चाल सब चलने लगे हैबुद्धिमत्ता कही खोने लगी है।न जाने, क्या हो गया है सबको?न जाने किसकी नज़र लगी यहाँ?आज दम तोड़ रही इंसानियत यहाँ।‘अनु माहेश्वरी’चेन्नई

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26 Comments

  1. mani 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  3. डी. के. निवातिया 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  4. Madhu tiwari 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  5. Lucky 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  6. Meena Bhardwaj 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  7. Rajeev Gupta 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  8. Kajalsoni 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  9. babucm 09/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/03/2017
  10. आलोक पान्डेय 10/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 11/03/2017
  11. vijaykr811 24/03/2017
    • ANU MAHESHWARI 25/03/2017
  12. chandramohan kisku 05/04/2017
    • ANU MAHESHWARI 05/04/2017

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