इंतज़ार – अजय कुमार मल्लाह

इंतज़ार को कैसे ये मालूम हुआ होगा,तन्हाई का खोदा किसने कुंआ होगा,कि ज़िक्र भी करता हूँ, तेरी फिक्र भी है,मेरी इस दुखती रग को किसने छुआ होगा।आज भी ज़ाहिर नहीं कर सकता जज़्बात,होती है सिर्फ तुमसे ख़्वाबों में मुलाक़ात,अब सामने नज़र आते हो तुम जब भी,तो जाने क्यूँ होते नहीं काबू में हालात।कुछ सोच कर रूक जाता हूँ, ठहर जाता हूँ,तेरी तरफ़ बढ़ते कदमों को वापस लाता हूँ,कि भूल ना हो जाए कोई तुझसे बात करते वक़्त,मै अब भी अपने लबों को ये बात समझाता हूँ।है अब भी तड़प पाने की तुझको करुणा,तेरे लबों से अच्छा लगे अपना नाम सुनना,क्यूँ ख़ामोश है खड़ी तु तस्वीर में अपनी,मैंने छोड़ा नही अब तक तेरे संग सपने बुनना।

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16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 09/03/2017
  2. mani 09/03/2017
  3. Madhu tiwari 09/03/2017
  4. डी. के. निवातिया 09/03/2017
  5. Lucky 09/03/2017
  6. Meena Bhardwaj 09/03/2017
  7. babucm 09/03/2017
  8. ajay sen 17/03/2017

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