देखो क्षितिज की ओर— मधु तिवारी

होती है संध्या होता यही भोरयहि है धरा अम्बर का छोरदेखो तुम क्षितिज की ओरमिले जहाँ पर भूमि आकाशहोता खत्म सविता प्रकाशनहीं आगे इसके कुछ औऱदेखो तुम क्षितिज की ओरये क्या ! गया कहा क्षितिज आगेपकड़ने को आतुर मन वहीं भागेशायद मिल जाए उसका कोई कोरदेखो तुम क्षितिज की ओरमृगतृष्णा केवल मन की हैछोड़ा जिसने जीवन जी हैबैठा अन्तरमन मे चोरदेखो तुम क्षितिज की ओरथोड़ा मिला तो चाहे ज्यादाज्यादा मिला, करें औऱ इरादाअन्त नहीं, तृष्णा का चले जोरदेखो तुम क्षितिज की ओरओ क्षितिज ! तुम दूर रहो दुनिया से बस यहि कहोमुझे पाने न भटको इस खोरदेखो तुम क्षितिज की ओरमधु तिवारी

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16 Comments

  1. Madhu tiwari 07/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  3. Kajalsoni 07/03/2017
  4. Meena Bhardwaj 07/03/2017
  5. ANU MAHESHWARI 08/03/2017
  6. Madhu tiwari 08/03/2017
  7. डी. के. निवातिया 08/03/2017
  8. Madhu tiwari 08/03/2017
  9. babucm 08/03/2017
    • Madhu tiwari 08/03/2017
  10. कृष्ण सैनी 08/03/2017
    • Madhu tiwari 08/03/2017

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