गफ़लत – शिशिर मधुकर

कोई सज के सँवर के काश मुझको भी रिझाता आँखों से बात कर हरदम बहुत नज़दीक आता मिटा देता वो खुद की हस्ती अगर पहलू में मेरेमेरा चेहरा भी फिर फूलों सा खिलता मुस्कुराता चाहने भर से मगर मिलती नहीं सौगात कोई मालिक ने खुद की मर्जी से सभी माला पिरोईकिसी के सीने में दफ़न राज़ तुम जानोगे कैसेजाने कितनों ने इसी गफ़लत में जिंदगी खोईं शिशिर मधुकर

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19 Comments

    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  1. कृष्ण सैनी 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  2. कृष्ण सैनी 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  3. कृष्ण सैनी 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  4. Kajalsoni 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  5. डी. के. निवातिया 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  6. Meena Bhardwaj 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  7. कृष्ण सैनी 07/03/2017
  8. Madhu tiwari 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 07/03/2017
  9. babucm 07/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 08/03/2017

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