जैसे हो सावन की प्रथम फुहार,,,

तेरे नैनो से छलक रही है तेरे प्रेम की रस -धार तन – मन मेरा भीग रहा हैजैसे हो सावन की प्रथम फुहार,,,खुद को मैं भी जान रही हूँ तेरी नज़रों से पढ़ कर हिरनी जैसी चंचल हूँ मैंलावण्य कुसुम से बढ़करदे -देकर उपमाएं तुमने मेरा रूप दिया है सँवारतन – मन मेरा भीग रहा हैजैसे हो सावन की प्रथम फुहार,,,तेरी एक चाह पर अपनासर्वस्व तुझे मैं कर दूँ अर्पणह्रदय में मेरे बसा है तूमेरा तन – मन तुझे समर्पणनहीं है कुछ भी ऐसा मुझमेजिस पर तेरा न हो अधिकारतन – मन मेरा भीग रहा हैजैसे हो सावन की प्रथम फुहार,,,एक-दूजे में अस्तित्व समायापृथक नहीं अब हम दोनोंतुझमे मैं हूँ और मुझमें तूइस तरह से पूर्ण हुए हम दोनोंआँखों से मेरी बरस रहा हैतेरे हृदय का अप्रतिम प्यारतन – मन मेरा भीग रहा हैजैसे हो सावन की प्रथम फुहार,,,सीमा ” अपराजिता “

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9 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/03/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 05/03/2017
  2. Kajalsoni 05/03/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 05/03/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 05/03/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 05/03/2017
  4. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 06/03/2017
  5. C.M. Sharma babucm 06/03/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/03/2017

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