KAVITA

कविता ——–शब्दों को तोड़ -मोरड़कर इधर -ऊधरकर जो लिखते जा रहा नाम दे रहा कविता। हृदय में दबी पड़ी क्रांति मन शिकंजे सभी तरह की को तोड़कर जब सर उठाकर खड़ी होती है नाम दे रहा हूँ कविता। जीवन की दौड़ में पीछे रह जा रहा हूँ ,आगे बढ़ता हूँ ठोकर खाकर गिर जा रहा हूँ फिर खड़े होकर दौड़ रहा हूँ नाम दे रहा हूँ कविता। सुबह नव किरण के जैसी स्वप्न की निर्जन श्मशान में उगी हरे घास में आशा की सिंचाई कर रहा हूँ नाम दे रहा हूँ कविता। ——-चंद्र मोहन किस्कु

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7 Comments

  1. vijaykr811 01/03/2017
    • chandramohan kisku 04/03/2017
  2. डी. के. निवातिया 01/03/2017
    • chandramohan kisku 04/03/2017
  3. babucm 01/03/2017
    • chandramohan kisku 04/03/2017
  4. Madhu tiwari 04/03/2017

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