मेरी मनमानियाँ – शिशिर मधुकर

करूँ मैं बात अब किससे ना मेरा कोई साथी है जले अब लौं भी ये कैसे सूखे दीपक में बाती है यहाँ मौसम बदलने से हवा का रुख बदलता हैकभी देती थी जो ठंडक वही अब घर जलाती है जिसे अपना समझ मैंने हर इक राज बांटा था मुझे गैरों के जैसा मान वो सब कुछ छुपाती हैजमाने ने कहा मुझसे मैं उसकी बात भी सुन लूँ मेरी मनमानियाँ लेकिन अब मुझको रुलाती है जीवन की राह में मधुकर सभी सपने सजाते हैंखिलती बहारें उनमें मगर किस्मतों से आती हैं शिशिर मधुकर

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14 Comments

  1. डी. के. निवातिया 28/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/03/2017
  2. Meena Bhardwaj 28/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/03/2017
  3. ANU MAHESHWARI 28/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/03/2017
  4. Madhu tiwari 28/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/03/2017
  5. Shabnam 01/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/03/2017
  6. Kajalsoni 01/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/03/2017
  7. babucm 01/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 02/03/2017

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