क्यों उलझे है कच्चे मन

मन की महिमाकेवल मन ही जानेपागल है ये मनबावरा है ये मनएक है यह मनजहा चाहे ये मनवहा लगावेन है अंकुश कोईइस मन परभागे सरपट ये मनयहा से वहाकोई जोर नहींइस मन परजितना सुलझाऊँउतना उलझता हैबच्चो का ये कच्चा मन

रफ़तार है नई नईजीवन में उनकेचाहत है अववल कीमुश्किल है चलनाइस गुजरते वक्त के साथघर करलिया हैमानो इस फेलते तनाव नेउम्मीद है कही ज्यादा कीइस कच्चे मन से

ये बच्चा है जब तककच्चा है समझ से तब तककच्चा है रिश्ते नाते से सबकच्चा है बातो से मुह कीज्यो ज्यो बढाती है उम्रत्यों त्यों बदलता है नजरियाघिर जाता है ये बचपनपाप के गलियारों मेंक्यों उलझ जाता हैये कच्चा मन बच्चो का

हर बच्चा है अलगहर सौच है उनकी अलगहर दृष्टिकोण है उनका अलगफसा है सुख दुःख के भवर मेंजो छाप पड़ेगी इस मन परपड़ी रहेगी वो जीवन भरये भविष्य है इस देश केमत लगने दो ग्रहण मासूमियत कोमत खोने दो मन की चंचलतामत खोने दो उनका भोलापनमत उलझने दो इसकच्चे मन को………….!

खुले आसमान मेंपंख लगाकरउड़ने दोकच्चे मन को…..!

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5 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 27/02/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/02/2017
  3. Kajalsoni 27/02/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 27/02/2017
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 28/02/2017

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