रोना—डी के निवातिया

रोना तो बस मन का बहलावारोकर इंसान हर दर्द सह जाताआंसुओं में अगर होती ताकतये ज़माना कब का बह जाता ।मत लुटाना ये बेशकीमती मोतीये तो पहचान है संवेदनाओं कीहो सके तो रोक लेना बहने सेये बह गये फिर कुछ न रह जाना ।।।।।डी के निवातिया ।

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12 Comments

  1. Meena Bhardwaj 04/03/2017
    • डी. के. निवातिया 09/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" 04/03/2017
    • डी. के. निवातिया 09/03/2017
  3. Kajalsoni 05/03/2017
    • डी. के. निवातिया 09/03/2017
  4. ANU MAHESHWARI 05/03/2017
    • डी. के. निवातिया 09/03/2017
  5. Madhu tiwari 05/03/2017
    • डी. के. निवातिया 09/03/2017
  6. babucm 06/03/2017
    • डी. के. निवातिया 09/03/2017

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