मैं आहत होती हूं—मधु तिवारी

मैं आहत होती हूं बेटियों पर जुल्म समाचार सेअपने गैरो से जुझने औऱ होते दो चार सेमैं आहत होती हूं ग ऊ पे अत्याचार सेहोते दुर्दशा से और पड़ते बीमार सेमैं आहत होती हूं पिल्ले की चित्कार सेकराहते पीड़ा से दर्द भरे पुकार से मैं आहत होती हूं पक्षी के क्रंदन सेघोंसला उजड़ने से उनके मौन रुदन सेमैं आहत होती हूं फैले कहीं भी कचरे सेदूसरों पर थोपने से होते हुए झगड़े सेमैं आहत होती हूं व्यर्थ बहते पानी से घोर लापरवाही से न होते निगरानी सेमैं आहत होती हूं तेज वाहन रफ्तार सेहोते हुए टक्कर से मौत के कगार सेमैं आहत होती हूं बाहर जाते शौच सेगुटखा चबाने से थूकते बेखौफ सेमधु तिवारी

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17 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 10/02/2017
  2. डी. के. निवातिया 10/02/2017
  3. Meena Bhardwaj 10/02/2017
  4. Kajalsoni 10/02/2017
  5. ANU MAHESHWARI 10/02/2017
    • Madhu tiwari 10/02/2017
  6. nivedita pandey 11/02/2017
    • Madhu tiwari 03/03/2017
  7. babucm 11/02/2017
    • Madhu tiwari 11/02/2017

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