जब रातो का अंधियारपन

जब रातो का अँधियारापन दिन में घुलने लग जाता है।जब जीवन का पल पल भारी हो शूलों सा चुभने लग जाता हैजब दुनिया का ये खेल तमासा बेमानी हो जाता है तब दुनिया भर के लिए हम थोड़े अभिमानी हो जाते है।सच कहते हैं फिर भी थोड़े से बेमानी हो जाते हैं।जब चिंताओं की रेखाएं माथे पर दिखने लगती हैंजब दुविधाओं के बादल में सब आशाएं छुपने लगती हैंजब खुदके सपने भी हमको कुछ बोझ दिखाई देते हैंखुदके निर्मित रस्ते भी जब गलत दिखाई देते हैंजब दुनियाभर की नजरो में एक बच्चा मरने लगता हैजब दुनियाभर के बोझों से खुदका ही कन्धा जलने लगता है।खेल खिलोनो की दुनिया जब विस्तृत लगने लगती हैअब आगे जाने क्या होगा हर धड़कन डरने लगती है लेटे लेटे माँ बाबा की जब यादें दौड़ी आती हैउनके प्रति कर्तव्यों की चिंताए अकुलाती हैंतब मन अपना भी घर की दहलिजो के अंदर रहना चाहता है तब मन अपना भी घर की देहलिजो के अंदर रहना चाहता हैमाँ की गोदी में एक नन्हा सा बालक सोना चाहता हैएक छोटा लड़का पापा के सीने लगना चाहता हैजब रातो का अंधियारपन दिन में घुलने लग जाता हैजीवन का पल पल भरी हो शूलों सा चुभने लग जाता है।-Rahul awasthi

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