चालाकी से गहते हैं -शिशिर मधुकर

मुहब्बत को भुला दें हम वो हमसे ये कहते हैं दर्द का क्या पता उनको जो ना चोट सहते हैं ईंट गारे का घर भी तोड़ना आसां ना होता हैइसकी छत के तले कितने अपने लोग रहते हैं उल्फ़त के सफ़र में कोई भी वापस ना लौटा हैइस धारा के संग दीवाने तो मरकर भी बहते हैंमुहब्बत को सदा पहरे लगा ना जीत सकते हैं नफरत के सारे महल यहाँ आखिर में ढहते हैं मुसीबत ज़रा आने पर वो हरदम भाग जाते हैंमधुकर जो किसी को यहाँ चालाकी से गहते हैं शिशिर मधुकर

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14 Comments

  1. Meena Bhardwaj 01/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/02/2017
  2. Madhu tiwari 01/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/02/2017
  3. mani 01/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/02/2017
  4. babucm 01/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 01/02/2017
  5. डी. के. निवातिया 02/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 02/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 03/02/2017
  6. Kajalsoni 03/02/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/02/2017

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