आज तन पर प्राण भारी

आज तन पर प्राण भारी

मन हुआ स्वच्छन्द जैसेतोड़ सारे बंध जैसेदेह की परिधि में सिमटे अब नहीं यह रूह सारीआज तन पर प्राण भारी
 
लोक क्या परलोक क्या अबघोर तम आलोक क्या अबमैं समाहित सृष्टि में अब, और सृष्टि मुझमे सारीआज तन पर प्राण भारी
 
वेश क्या परिवेश क्या अबधर्म जाति शेष क्या अबसत्य शिव सुन्दर इसी में सब विलय इस्से ही जारीआज तन पर प्राण भारी
 
और तुम मैं भी भला क्याकिस लिए अब यह छलावाएक ही तो आग से उठती है लपटें ढेर सारीआज तन पर प्राण भारी
                                  -सोनित

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14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 29/01/2017
  2. Shabnam 29/01/2017
  3. mani 29/01/2017
  4. babucm 29/01/2017
    • सोनित 29/01/2017
  5. निवातियाँ डी. के. 30/01/2017
  6. Madhu tiwari 03/02/2017

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