वटवृक्ष………!—-ऋतुराज

आज याद आती है-पिताजी की वो बातेंथकान और तनावग्रस्त आकरलंबी सांसे ले बिस्तर पर ऐसे बैठनाजैसे-किसी परिंदे को मिला हो अपना बिछड़ा परिवारसुकून भरी शाम की चायऔरमाँ की ममतामयी मुस्कान की मिठास के बीच उनका बोलना-“बहुत मुश्किल है मगरमच्छों के बीच रहनान जाने कौन ,कब और कहां निगल जाये-इस संस्कृति की अजीब व्यवस्था है-यहाँ ज़िन्दगी भी उत्कोच मांगती है|धन और सिफारिशों के इस खेल में मैं तो विपन्न सा प्रतीत होता हूँ|कुछ क्षण अपलक शून्य में निहारते-धीरे से मुस्कुरा कर प्रश्न करना-भौतिकता के इस युग में, मेरे व्यक्तित्व की नैतिकता क्या अप्रासंगिक है?सिफारिशों के इस दुर्धर्ष लपट में –मेरी कर्मठता का हठयोग, क्या अप्रासंगिक है?इस व्यवहारिकता के पैमाने में-मेरी मित्रता की परिभाषा, क्या अप्रासंगिक है?आदर्शों और सिद्धान्तों से सींचा मेरा जीवन, क्या अक्षम्य है?फिर,मेरी ओर देख-उनका यह कहना —बेटा, तू भी मेरी इन मूल्यों में सींचा मेरा स्वप्न है,मेरा वटवृक्ष है|तू तो छाया देगा न?और मैं, मन ही मन कहता —-यह छाया आपकी ही तो हैआपको शीतल करने को सदैव तत्पर|—-ऋतुराजमुजफ्फरपुर

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4 Comments

  1. babucm 21/01/2017
  2. sumit jain 21/01/2017
  3. निवातियाँ डी. के. 21/01/2017
  4. Rituraj Srivastava 21/01/2017

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