बिटिया : मेरी संजीवनी मान्यता

मैं सात समुन्दर पार हु रहता

हर पल जल थल छू के कहता

नेत्र बांध करुणा के बल से

क्षतिग्रस्त हु उस धरातल पे

 

झरोखे मैं आकर बिटिया पुकारे

कैसे जियु बिन तेरे सहारे

पापा हम तेरी तस्बीर निहारे

लौट के आ फिर कभी न जा रे

 

न कुछ खेल खिलोने चाहु

न सूंदर वस्तुओ की कामना

हर पल डरावना लगता तुम बिन

कैसे करु मैं इसका सामना

 

तेरी गोद मे समूचा स्वर्ग है

तू ही करतूरी का आनंद

तू ही मयूरी का नृत्य है

तेरे होने से मैं संपन्न

 

पिसते यादो को ह्रदय पर

अब समय के टुकड़े पत्थर बनकर

वो स्पर्श नन्हे हाथो का तेरा

वैकुंठनुभूति बातो को सुनकर

 

आकर मेरे गले से लग जाओ

बिटिया तू मेरा जहाँ रे

ब्याकुलता से प्राण से जाते

संजीवनी मेरी और कहाँ रे

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8 Comments

  1. babucm 20/01/2017
  2. निवातियाँ डी. के. 20/01/2017
  3. sumit jain 21/01/2017

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