सफ़र ख़त्म हो चुका – मनुराज वार्ष्णेय

सफ़र ख़त्म हो चुकारूह उसकी सो चुकी जान मेरी जा चुकीकुछ नही अब और बाकी जिंदगी नर्क हो चुकीप्यार के आसमां को झुका सफ़र ख़त्म हो चुकाशनि का ये प्रहार हुआ सोचा न वैसा हुआप्यार को मेरे किसी की लग गयी बददुआआज दे गए पत्र वो पड़ने को आतुर हुआपड़ते ही रोई ये आँखे ईमान सारा खो चुकासफ़र ख़त्म हो चुकापत्र की शैली अनोखी और थी भाषा निरालीसमझ नही मैं पा रहा था प्यार दे गयी या बदहालीतारीफ करते जा रही थी और बीच की दूरी बड़ा लीहक्का बक्का रह गया मैं और उत्सुकता खो चुकासफ़र ख़त्म हो चुकापैर नही आगे बड़े और टूट गयी आशा हमारीसच्चा प्रेम पूरा न होता सीख ली ये बात भारीअब करूं क्या सोच कर ये और बढ़ गयी बीमारीजिसको लेके शुरू हुआ सफ़र वो ही साथ छोड़ चुका सफ़र ख़त्म हो चुकाभगवान चाहेंगे तो मिलेंगे फिर किसी और रास्तेकह गयी ये बात मुझसे उस खुदा के वास्तेखो गए वो सारे मौके जो भी मेरे पास थेप्यार को ठंडी हवा का आश्वाशन वो दे चुकासफ़र ख़त्म हो चुकाप्यार अधूरा रह जाये ऐसा नही मैं होने दूँगा जब तक न कहेगी आने को सफ़र ख़त्म नही होने दूंगाइंतजार और इंतजार सिर्फ इन्तजार ही करता रहूँगा साथ न उसका ही सही यादों से दिल बहलाता रहूँगा

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3 Comments

  1. babucm 20/01/2017
  2. निवातियाँ डी. के. 20/01/2017

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