स्वप्न और मन

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रात की चादर ओढ़स्वप्न करते हैचहल-पहलरंग बिरंगी बग्घी में बैठगुफ़्तगू करते हैहवाओ सेदी है दस्तक रंगीन लोक मेंये बिखरते है रंगतरह तरह केभीड़-भाड़ हैरंगीन स्वप्न कीहर कोई कहते हैअपनी शैलीकुछ अच्छी तो कुछ बुरीये मायाजाल हैरंगीन स्वप्न का

रिश्ता है गहरास्वप्न कामन सेये जनक हैरंगीन स्वप्नों के

परिंदा है मन तोजो उड़ैपंख लगाकरख्यालों केउन्मुक्त गगन मेंडाल डाल तोपाथ पाथन देख सकेतेज आँखेन वो आधीन हैहाथ केन कोई रुपन कोई रंगन कोई आकारवे निहारता अद्य कोकिन्तु भटकता हैजाने कहाँ कहाँ

मन हैजितना सुन्दर,जितना निर्मल,जितना पवित्रजितना पारदर्शीस्वप्न भी होते हैउतने स्पष्ट,उतने सटीकउतने सुलझे औरउतने सुन्दरमन है तोस्वप्न हैय ही तोअटूट रिश्ता हैस्वप्न का मन से

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6 Comments

  1. babucm 19/01/2017
  2. निवातियाँ डी. के. 19/01/2017

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