कचरेवाली

इक कचरेवाली रोज दोपहर..कचरे के ढेर पे आती है..तहें टटोलती है उसकी..जैसे गोताखोर कोई..सागर की कोख टटोलता है..

उलटती है..पलटती है..टूटे प्लास्टिक के टुकड़े को..और रख लेती है थैली में..जैसे कोई टूटे मन को..इक संबल देकर कहता है..ठुकराया जग ने दुःख मत कर..ये हाथ थम ले..तर हो जा..इक कचरेवाली रोज दोपहर..कचरे के ढेर पे आती है..

जहाँ शहर गंदगी सूँघता..वहाँ वही जिंदगी सूँघती..कूड़े की संज्ञा में कितनी..कमियाँ वह हर रोज ढूंढती..हर कूड़े को नवजीवन का..आशीष दिलाने आती है..दूषित होती हुई धरा का..दर्द सिलाने आती है..इक कचरेवाली रोज दोपहर..कचरे के ढेर पे आती है..

                                        -सोनित

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5 Comments

  1. Madhu tiwari 18/01/2017
  2. निवातियाँ डी. के. 18/01/2017
  3. Shishir "Madhukar" 18/01/2017
  4. babucm 19/01/2017

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