आज मैंने देखा है- ऋतुराज

आज मैंने देखा है-एक कली मुरझाई सीकैद स्वर्ण पिंजरे मेंथोड़ी क्षुब्ध थोड़ी शरमाई सी।आज मैंने देखा है-अंजन भरे लोचन सेस्वप्नाश्रु झरते हैंअधरों पर मुस्कान लाती हैवह बुलबुल घबराई सी।आज मैंने देखा है-उत्कण्ठिता के नयùनों कोदिवा-स्वप्न में खोई सीरोती दीप-राग में- बन प्रिय-पराई सी।आज मैंने देखा है-वह मीठी कूक सेदिवस को राह दिखाती-भटकती वह अंतःवन मेंमृगलोचनी भरमाई सी।द्वारा- ऋतुराज

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5 Comments

  1. Madhu tiwari 14/01/2017
  2. Shishir "Madhukar" 15/01/2017
  3. babucm 15/01/2017
  4. निवातियाँ डी. के. 16/01/2017

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