चल अम्बर अम्बर हो लें..

चल अम्बर अम्बर हो लें..धरती की छाती खोलें..ख्वाबों के बीज निकालें..इन उम्मीदों में बो लें.. सागर की सतही बोलो..कब शांत रहा करती है..हो नाव किनारे जब तक..आक्रांत रहा करती है..चल नाव उतारें इसमें..इन लहरों के संग हो लें..ख्वाबों के बीज निकालें..इन उम्मीदों में बो लें.. पुरुषार्थ पराक्रम जैसा..सरताज बना देता है..पत्थर की पलटकर काया..पुखराज बना देता है..हो आज पराक्रम ऐसा..तकदीर तराजू तौलें..ख्वाबों के बीज निकालें..इन उम्मीदों में बो लें.. धरती की तपती देही..राहों में शूल सुशज्जित..हो तेरी हठ के आगे..सब लज्जित लज्जित लज्जित..संचरित प्राण हो उसमें..जो तेरी नब्ज टटोलें..ख्वाबों के बीज निकालें..इन उम्मीदों में बो लें..

                                          #सोनित
www.sonitbopche.blogspot.com

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10 Comments

  1. Madhu tiwari 08/01/2017
  2. कृष्ण सैनी 09/01/2017
  3. babucm 09/01/2017
    • सोनित 11/01/2017
  4. Shishir "Madhukar" 09/01/2017
  5. निवातियाँ डी. के. 09/01/2017

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