ग़ज़ल-कट रही या जिंदगी को जी रहा हूँ

कट रही या जिंदगी को जी रहा हूँ |बेखबर हो मैं लबो को सी रहा हूँ ||हर तरफ है दौर नफरत से भरा जो |है नहीं मरजी मेरी पर जी रहा हूँ ||खून पानी सा बना है हर किसी का |जाम हर दिन इक लहू का पी रहा हूँजात महजब खेलते है खेल आदम |जीतने को भाग सा मैं भी रहा हूँ ||है नहीं कोई ‘मनी’ अपना रहा सा |बेमानी सी ज़िन्दगी मैं जी रहा हूँ ||मनिंदर सिंह “मनी”

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12 Comments

  1. Madhu tiwari 08/01/2017
    • mani 10/01/2017
  2. ANU MAHESHWARI 08/01/2017
    • mani 10/01/2017
  3. कृष्ण सैनी 09/01/2017
    • mani 10/01/2017
  4. Meena Bhardwaj 09/01/2017
    • mani 10/01/2017
  5. Shishir "Madhukar" 09/01/2017
    • mani 10/01/2017
  6. निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
    • mani 10/01/2017

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