“अंतरमन का अवलोकन”

उन खोखले वादों की कटारों से,हम हररोज़ कटते रहते है,उन भयंकर भ्रमजालों से,बहार निकल नहीं पाते है ।उस अदृश्य आशा की तलाश में,हररोज़ भटकते रहेते है,हर शाम खुद से ही हार कर,फिर मायूस हो जाते है ।उन अविरत आडंबरों से,हम इतने कायर बन चुके है,अपनी ही सच्चाई के सुरों को,हम सुन नहीं पाते है ।अपने ही जूठ के जंगलों में,अक्सर हम खों जाते है,अपमानों के आँसुओ को,घूँट घूँट कर पी जाते है ।कभी दोस्ती के दलदल में,तो कभी प्रेम की मृगजाल में,हर बार हम फंस जाते है,लाख कोशिशों के बाद भी,उस दर्द ए दरिया में,हर बार हम डूब जाते है ।आकर्षणों की आँधी में,हर बार  हम बँह जाते है,औकात से आगे सोचने की गलती,अक्सर हम कर जाते है ।घनघोर निराशा की नाव में,हम अक्सर हिंचकोले खाते है,उन अनगिनत ठोकरों के बाद,अब दर्द को भी महेसूस नहीं कर पाते है ।हर दिन पैसे की अंधी प्यास में,खुद को ही बेचते रहेते है,अब तो खुद ही बोली लगाकर,खुद को ही खरीदते रहेते है।- निसर्ग भट्ट

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3 Comments

  1. babucm 08/01/2017
  2. Madhu tiwari 08/01/2017
  3. कृष्ण सैनी 09/01/2017

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