निशाँ ढूंढते हैं…..सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

लोग मेरी ज़िन्दगी का निगेहबाँ ढूंढते हैं…अफसानों में मेरे इश्क़ का जहॉं ढूंढते हैं…दो पहर रात बाकी है सूली को अभी से….गिरह लगाने को गर्दन पे निशाँ ढूंढते हैं….मोहब्बत उसकी से ख़ौफ़ज़दा है सब इतने…हर अफ़साने में उसीकी ही दास्ताँ ढूंढते हैं….न सोचा सलीब पे लटकाने से पहले जिसको…रहनुमाई को अब हर गली मकाँ ढूंढते है…तिनका-२ तक फूंक डाला आशियाँ मेरे का…राख के ढेर में अब “बब्बू” के निशाँ ढूंढते हैं…..\/सी. एम्. शर्मा (बब्बू)

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14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 05/01/2017
    • babucm 07/01/2017
  2. Meena Bhardwaj 05/01/2017
    • babucm 07/01/2017
  3. Madhu tiwari 05/01/2017
    • babucm 07/01/2017
  4. ANU MAHESHWARI 05/01/2017
    • babucm 07/01/2017
  5. निवातियाँ डी. के. 05/01/2017
    • babucm 07/01/2017
  6. mani 06/01/2017
    • babucm 07/01/2017
    • babucm 09/01/2017

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