ज़िन्दगी बीत रही थी – अनु महेश्वरी

अपनी ख्वाहिशों को रोकसुबह से शाम तकसबकी हाँ में हाँ मिलामानो औरो के लिए हीबस जी रही थी वहसुबह सूरज उगने के पहले उठनासब की फरमाइशें पूरी करनायह उसकी दिनचर्या बन चुकी थीशाम ढल कब रात हो जाती थीवह बेखबर रहती थीवह बस जिए जा रही थीज़िन्दगी बीत रही थी।पर अब हालात बदल चुके थेबच्चे अब बड़े हो चुके थेसबकी अपनी भी एक दुनिया हो गयी थीउनके पास अब समय नहीं थाहर शाम अब उसकी अकेले बितने लगी थीक्योंकि बच्चों के अलावा उसने भीज़िन्दगी देखी ही नहीं थीइसीलिए उम्र के इस मोड़ पे आआज वो अकेलापन महसूस कर रही थीवह बस जिए जा रही थीज़िन्दगी बीत रही थी।अब संयुक्त परिवार तो रहे नहींयह समय एकदिन आना निश्चिन्त थाकाश समय रहते आनेवाले कल कीआहट पहचानी होती उसनेकाश “केवल अपने लिए” उसनेथोड़ा सा समय निकाला होताकुछ दोस्त बनाए होते उसनेया कोई शौक अपनाया होतातो शाम अकेले न बितानि परतीवह बस जिए जा रही थीज़िन्दगी बीत रही थी। अनु महेश्वरीचेन्नई

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10 Comments

  1. babucm 25/12/2016
    • ANU MAHESHWARI 26/12/2016
  2. Shishir "Madhukar" 26/12/2016
    • ANU MAHESHWARI 26/12/2016
    • ANU MAHESHWARI 26/12/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 26/12/2016
    • ANU MAHESHWARI 26/12/2016
  4. Meena Bhardwaj 28/12/2016
    • ANU MAHESHWARI 28/12/2016

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