अमीरी-गरीबी—ज़िन्दगी पर कविता—डी के निवातिया

अमीरी-गरीबी

बहस छिड़ गयी एक दिनअमीरी और गरीबी में !!

नाक उठा ‘अमीरी’ बोली बड़े शान सेकाम बन जाते है सिर्फ मेरे नाम सेहर किसी की चाहत पाना मुझकोदूर हो जाते कष्ट सिर्फ मेरे दाम से !!

आन बान शान दिखाना हो जिसकोआकर सानिध्य मेरे करता डिस्कोदुनिया का सरताज बना देती हूँ, मैंखुले भाग्य, जिसने जाना मुझको !!

ठाठ बाट है मेरे दुनिया में निरालेपड़ जाते है अच्छो-२ के मुहँ तालेबिन मेरे जिंदगी में कोई रास नहीसफ़ेद हो जाते मुझसे धंधे सारे काले !!

दुनियादारी की इकलौती जान हूँबड़प्पन की खुद बनी पहचान हूँउसके सर पर सदैव रहता ताज़जब बन जाती किसी की गुलाम हूँ !!

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सुनकर सारी राम कहानीधीरे से बोली ‘गरीबी’ रानीबहुत सुन लिया तेरा बखानबहन अब सुन मेरी जुबानी !!

माना के कुछ भी मुझ में ख़ास नहीइसलिए करता मेरी कोई आस नहीदुःख , दीन, दरिद्रता मेरी झोली मेंबस इसके सिवा कुछ मेरे पास नही !!

गरीबी के हाथो की लकीरो से जो रक्त बहती हैंबस उसी के दम पर अमीरी तू  जिन्दा रहती हैंवक़्त मिले तो झाँक लेना दिल किसी गरीब कासमायी उसमे तमन्नाये तमाम बेलिबास रहती है !!

तू क्या जाने कीमत किसी कम-नसीब कीकभी झोली खाली होती नही बे-नसीब कीउसके आँसु बहा-बहा कर भी कम नहीं होतेतू क्या जाने कितनी अमीर होती आँखें ग़रीब की…!!

खरीद सके तो खरीद के दिखादुःख दर्द और जान किसी कीमान जाऊं उस दिन लोहा तेरादे सके वापस ढली उम्र किसी की !!

जाकर देख इंसानियत के द्वारेजिस घर गरीबी शान से रहती है !घुटने टेक देती है अमीरी वंहा परजिस जगह रब की इनायत होती है !!

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रचनाकार ::—-  डी के  निवातिया

 

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16 Comments

  1. Madhu tiwari 03/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
  2. Shishir "Madhukar" 04/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
  3. babucm 04/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
  4. ANU MAHESHWARI 04/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
  5. vivekbijnori 04/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
  6. Meena Bhardwaj 04/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017
  7. mani 04/01/2017
    • निवातियाँ डी. के. 09/01/2017

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