अगर जो प्रेम ना होता – शिशिर मधुकर

अगर जो प्रेम ना होता कभी के भूल जाते हम तेरी यादों के नगमों को कभी ना गुनगुनाते हमतेरे सीने से लगकर के सदा एक चैन पाया था तंहाइयो में वरना यूँ ही ग़म होते नहीँ कुछ कमशहर की भीड़ में जब से तुम्हारा हाथ छूटा है उलझने बढ़ गई मन की और नज़रें हैं मेरी नमचाँद से रूप को पाकर सकल रातें हुई उजली वरना मिट न पाया था मेरे अंदर का सारा तममेरे आगोश में तूने भी जब खुद को छुपाया था वक्त भी मुस्कराया था और लम्हे गए सब थमशिशिर मधुकर

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16 Comments

  1. M Sarvadnya 15/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 15/12/2016
  2. vivekbijnori 15/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 15/12/2016
  3. mani 15/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 15/12/2016
  4. Madhu tiwari 15/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 15/12/2016
  5. Meena Bhardwaj 15/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 15/12/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 15/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 16/12/2016
  7. babucm 15/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 16/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 16/12/2016

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