नववर्ष धरा पर कब ? ~ आलोक पान्डेय

ये नववर्ष हमें स्वीकार नहींहै अपना ये त्योहार नहींहै अपनी ये तो रीत नहींहै अपनी ये व्यवहार नहीं धरा ठिठुरती है शीत से आकाश में कोहरा गहरा हैबाग बाजारों की सरहद परसर्द हवाओं का पहरा है !सूना है प्रकृति का आँगनकुछ रंग नहीं – उमंग नहींहर कोई है घर में दुबकानववर्ष का ये कोई ढंग नहीं |देख रहा हूँ क्या त्योहार हैलोगों का कैसा व्यवहार हैक्या उत्सव का यही आचार है ? नहीं पावन कोई विचार है | ये देख मुझे आवे हॉसीक्या भूल गये भारतवासीउस दिन ! थी जब छायी उदासीप्रताड़ित ,शोषित असंख्य जन जन संन्यासी |घायल धरणी की पीड़ा कोक्या समझ सके भारतवासी ?जिनके षड्यंत्रों से घिरा राष्ट्र आज अधिक व्यथित खंडित त्रासी !अरि की यादों में निज दर्द भूलखो स्वाभिमान मुस्काते हैंदेशभक्ति का कैसा ज्वर चढा रचायह कलुषित नववर्ष मनाते हैं !!!नया साल नया कुछ हो तो सहीक्यों नकल में सारी अकल बही !ये धुंध कुहासा छंटने दोरातों का राज्य सिमटने दो;प्रकृति का रूप निखरने दो ,फाल्गुन का रंग बिखरने दो |प्रकृति दुल्हन का रूप धर, जब स्नेह सुधा बरसायेगीशस्य श्यामला धरती माता ,घर घर खुशहाली लायेगी|तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि,नववर्ष मनाया जायेगा;आर्यावर्त की पुण्यभूमी पर,मंगल गान सुनाया जायेगा|———————————–© कवि आलोक पान्डेय ———————————–

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10 Comments

  1. Madhu tiwari 14/12/2016
  2. babucm 14/12/2016
  3. M Sarvadnya 14/12/2016
  4. vivekbijnori 15/12/2016
  5. mani 15/12/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 15/12/2016
  7. ALOK PANDEY 16/12/2016
  8. आलोक पान्डेय 16/12/2016
  9. डा० के०पी० पाण्डेय . 18/03/2018

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