आशा-3…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

द्वन्द….इसलिए भी है की हम दूसरों से आशा करते हैं…कोई हमारे लिए करे….अपने से आशा नहीं करते हम…हमारे लिए क्या सही है…वो हम नहीं सोच रहे…कोई दूसरा सोच रहा है…जब तक हम दूसरों से आशा रखते हैं…अपेक्षा रखते हैं….हम अपने से दूर हैं…अपनी सच्ची ख़ुशी के लिए क्या करें…जब ये समझ गए तो आनंद आता है…दूसरों के कृत्यों से अर्जित आनंद जब नहीं मिलता…खेद होता..दुःख होता…आक्षेप लगाते हैं…दूसरों को सुधारने की कोशिश करते…फिर द्वन्द में…कौन अपना है कौन पराया…न समझ पाते हैं…न ही सहज हो पाते हम…अपने कृत्यों का आनंद अपना है…ना भी हो तो सुधारना अपने आप को आ जाता…बच्चे के मन में आशा उसको भाव देती खड़ा होने का…बच्चा जैसे खड़ा होने लगता गिरता है…बार बार गिरने पे भी खड़ा होने को प्रविर्ती नहीं छोड़ता…वो अपने से ही सीख रहा है…सुधार रहा है अपने को..फिर सफल हो जाता है…खड़ा हो जाता है…चलने लगता है…गिरता है फिर कोशिश करता है…और फिर भागता है….यही तो आशा से विश्वास का नाता है…बड़ा सहज सा…जो हम नहीं पहचानते….\/सी. एम्. शर्मा (बब्बू)

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18 Comments

  1. M Sarvadnya 13/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  2. mani 13/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  3. ANU MAHESHWARI 13/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  4. Tishu Singh 13/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  5. Madhu tiwari 13/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  6. निवातियाँ डी. के. 13/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  7. Meena Bhardwaj 13/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  8. Shishir "Madhukar" 14/12/2016
    • babucm 14/12/2016
  9. Bhola Shankar singh 23/12/2016
    • babucm 23/12/2016

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