शाला जाते देखती हूं—मधु तिवारी

लड़कियों को सायकल से शाला जाते देखती हूंखेतों मे धान की,शाला मे ग्यान की,फसलों को नित मैं, लहलहाते देखती हूंलड़कियां जो गांव से निकल नहीं पाती थीदो अक्षर पढ़कर ससुराल पहुँच जाती थीभूल जाती थी हँसना ,उन्हें खिलखिलाते देखती हूंलड़कियों को…..सपने को देखना, हो जाता था गुनाहपिता ,भाई, पति उसे देते थे पनाहभूल जाती थी हँसना,उन्हें खिलखिलाते देखतीलड़कियों को…..पढ़लिखकर एक दिन, सपने साकार करूँगीमेहनत के बल पर सपनों मे रंग भरूंगीखुद से किया हुआ, वादा निभाते देखती हूंलड़कियों को…..

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