आशा-2…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)..

आशा…..ज़िन्दगी में कितनी ज़रूरी है…प्राण हैं ये….बिना इसके जीवन निरर्थक सा है…मृत्यूतुल्य……जैसे कुछ है ही नहीं सब कुछ होते हुए भी….बीमार शरीर तो अच्छा हो सकता है…पर मन…जो आशा ही छोड़ दे…उसके लिए जीना मरने जैसा….सब जानते हैं कि हर इच्छा पूरी नहीं होती…फिर भी परेशान….कुछ मौत का आलिंगन करते हैं…बिना सोचे कि ज़िंदगी तो यही रहनी है…कभी सुख…तो कभी दुःख और फिर…किसने जाना कि दोबारा ऐसी ज़िन्दगी नहीं मिलेगी…तो अभी की ज़िन्दगी जीने की जगह…उसका अंत क्यूँ….सिर्फ भावावेश में….नहीं देखते की द्वन्द में भी आशा जीवित है…दरअसल मरती है ही नहीं आशा…बस हम देख नहीं पाते…पहचान नहीं पाते…शायद ऐसा हो….इसी द्वन्द में वो जीवित है…पर हम आशा को बल ना देकर…अपनी कुंठाओं को बल दे रहे हैं…अपने आप को न पहचान कर…सिर्फ और सिर्फ दोष देने..लेने पे लगे हैं…आशा भीतर ही भीतर दब के रह गयी है…उसकी आवाज़ महीन सी आ तो रही पर…हम ही नहीं सुन रहे हैं…\/सी.एम्. शर्मा (बब्बू)

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13 Comments

  1. Meena Bhardwaj 09/12/2016
    • babucm 09/12/2016
  2. ANU MAHESHWARI 09/12/2016
    • babucm 09/12/2016
  3. babucm 09/12/2016
    • ANU MAHESHWARI 09/12/2016
      • babucm 13/12/2016
    • babucm 13/12/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 09/12/2016
    • babucm 13/12/2016
  5. Shishir "Madhukar" 09/12/2016
    • babucm 13/12/2016

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