चपल बंदर – शिशिर मधुकर

किस्मत भी ये कैसे खेल रचाती है साथ में हीरे कभी दें देती है चपल बंदर के हाथ मेंजिसके लिए ऐसी चमक का मोल ही नहीं सौंदर्य बोध जो होता नहीं है उसके माथ मेंवैसे भी बगीचों में जब घुस जाते है वानर फूलों को तोड़ पेड़ों पे उछलते हैं जमकरमेरे आँगन में खिले फूल अत्याचार ना सहें ये सोच कर ही हमने तो नहीं पाला हैं बंदरशिशिर मधुकर

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10 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 05/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 05/12/2016
  2. Madhu tiwari 05/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 06/12/2016
  3. babucm 05/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 06/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 06/12/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 06/12/2016
    • Shishir "Madhukar" 06/12/2016

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