देवमानव

देवमानव – 1क्यों नहीं सारी स्त्रियां डूब कर मर जातीं पानी मेंक्यों नहीं सारे भूखे नंगे किसान मज़दूर मिलकर आत्मदाह कर लेतेक्यों नहीं ज़हर खाकर मर जाते सारे दलित पिछड़ेक्यों सब शौकीन हैं छिछड़ी व्यवस्थाओं में पिस घिस कर अपनी पिलपिली जीवन लीला की राम लीला खेलने केक्यों आनंद ले रहे हैं अपने शोषण का सब दबे कुचले कमज़ोर प्राणीक्यों समझौतों के जंगल में अपनी तुच्छ ज़रूरतों की प्यास के नशेड़ी अपना डेरा तम्बू तान कर मैला कुचैला करते फिर रहे हैं निर्मल आलीशान संसार कोक्यों इन्तज़ार में हैं ये सब कि कोई देवमानव आकर करेगा बलात्कारदेह का, इच्छाओं का, जीवन काघोंटेंगा गला, रेतेगा सर या गैस चैंबर में सुख शान्ति की नींद सुलायेगाहाथ पैर टूट गये हैं क्या सबके जो डूब कर मर नहीं सकतेमाचिस और घासलेट खरीद नहीं सकते तो चुरा ही लोऔर ज़हर नहीं मिल रहा तो फावड़े से एक दूसरे का सर ही फोड़ लोसमझो, जानो और जान लोतुम सब की सामूहिक मृत्यु ही चाबी है तुम्हारी सुख शान्ति कीदेवमानव उसी दिन मरेगा जिसदिन तुम सब ।

देवमानव-2कहीं दूर आकाश में श्वेतवर्ण परिधान में सुसज्जित, पंख फैलाता, बुझती झींपती आंखों के लिये हरे गुलाबी सपनों की सौगात लाता वह देवमानवआखिर कब उतरेगा विबाईयों की पेंटिंग का तरह दिखती सूखती तिड़कती खूबसूरत धरती की छाती परऔर चूस जायेगा बचा खुचा थोड़ा बहुत रसदूध भी सक्शन पम्प की शक्ति सेताकि दबे कुचले लोगों का सशक्त अस्तित्व बरकरार रह सकेसंघर्ष तुम्हारा अस्तित्व है, तुम सब संघर्षरत रहो श्रमकीटतुम्हारे अस्तित्व से ही अस्तित्व है देवमानव का ।

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6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 03/12/2016
    • Neera Kartik 03/12/2016
  2. babucm 03/12/2016
    • ANU MAHESHWARI 03/12/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 03/12/2016
  4. Madhu tiwari 03/12/2016

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