मजदूर

शीर्षक—“मजदूर”मैं अदना सा इन्सानहाथो में थामे कुदालसर पे बाँध गमछासुबह सबेरे निकलता हूँअपने झोपड़े सेअपने घर के चूल्हे के लिएअपने बच्चो के तक़दीर के लिएबापू की दवाई के लिएबस इतनी है मेरी पहचानमैं अदना सा इंसानहर सुबह मैं दिख जाता हूँकभी खेतो में मेड़ बनाते हुएकभी किसी के घर की दीवार बनाते हुएकभी नदियों की मनचली धारों को रोकते हुएकभी मंदिर की ईट जोड़ते हुएकभी मस्जिद की दीवार रंगते हुएकभी गुरूद्वारे की सफाई करते हुएकभी गिरजाघरो की घंटियाँ बांधते हुएबस इतनी है मेरी पहचानमैं अदना सा इंसान”मजदूर” नाम से जाने जिसे सारा जहान—-अभिषेक राजहंस

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2 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 30/11/2016
  2. Shishir "Madhukar" 02/12/2016

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