परिवर्तन—मुक्तक —डी. के. निवातियाँ

विचारो को आलोचनात्म रूप में ना अपनाकर सकारात्मक रूप से आमजन के ह्रदय के भाव समझे !! परिवर्तन के इस दौर में ये कैसी चली बयार हैधनाढ्य बैठे महलो में आमजन खड़े कतार हैकिस विद रुकेगी पैसे वालो की काला बाजारीजब मिल रहे नोट पांच सौ के बदले दो हजार है !!!!!डी. के. निवातियाँ [email protected]@@

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14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 26/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/12/2016
  2. ANU MAHESHWARI 26/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/12/2016
  3. mani 26/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/12/2016
  4. babucm 26/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/12/2016
  5. krishan saini 26/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/12/2016
  6. Meena Bhardwaj 28/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/12/2016
  7. vijay kumar Singh 29/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 01/12/2016

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