गज़ब ये अंदाज—ग़ज़ल—डी.के.निवातियाँ

वफा का रिश्ता भी खूब तुम निभाते हो !दिल में छुपाते हो, कभी ना जताते हो !!खोये रहते हो ख्यालो ख्वाबो में हर पल !और यारा से ही ये राज तुम छिपाते हो !!रखते हो शरीक-ऐ-हयात हर शै में अपनी !मगर ना जाने क्यों हम से नजरे चुराते हो !!हमे तो पसंद है गज़ब ये अंदाज भी तुम्हारा !गुजरते हो सामने से जब, जरा मुस्कुराते हो !!शायद अंदाज यही है मुहब्बत फरमाने काकरके बहाना बेरुखी का “धर्म” को सताते हो !!।।।??डी. के. निवातियाँ ??    

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14 Comments

  1. babucm 21/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/11/2016
  2. Shishir "Madhukar" 22/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/11/2016
  3. kiran kapur gulati 22/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/11/2016
  4. ANU MAHESHWARI 22/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 22/11/2016
  5. mani 22/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 24/11/2016
  6. Meena Bhardwaj 22/11/2016
    • निवातियाँ डी. के. 24/11/2016

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