कहानी बंद नोटों की – BY रितेश डोंगरे

कल तक जिस मैफिल की शान थी मै…..मगर आज खुद परेशान थी मै….. इमानदारों ने जननी सा कहलाया मुझे……गद्दारों ने तो गंगा में नहलाया मुझे…. कल तक इनके अनाज के निवालों की जान थी मै….. मगर आज खुदसे खुद परेशान थी मै….. कई नवाबों के सर का ताज थी मै….. झुटें नकाबों की सच्चाई का राज़ थी मै…… गरीबों की बरकत देखने हर पल मोहताज थी मै……किसीका स्वाभिमान तो किसी के लिए दान थी मै….. मगर आज खुदसे खुद परेशान थी मै……. किसी ने तडपते भीड़ की कतारों में देखा मुझे….किसी ने जालिम सा कचरे के ढेरों में फेका मुझे…. कल तक कई नाउम्मीदों को हौसलो सी उड़ान थी मै….. कई लालची परींदो को खुला आसमान थी मै…… मिट गयी आज सब एहमीयत मेरी… फिर भी कई मजबुरों को अब तक अन्जान थी मै….. बेईमान नेताओं को हार-जीत का सामान थी मै…….. सस्पेंड अफसरों के लिए तों जानलेवा हैवान थी मै…..मगर आज खुदसे खुद परेशान थी मै…..धुंदला गया था जिस्म मेरा अश्लील डान्स बारों में…. कईने लक्ष्मी सा सजाया था इमानी व्यापारों में…..तो कईने फरेआम बिकाया चुनावी बाजारों में ……काले धन के इस बवंडर में….मोदीजी के धनुष से निकला नुकीला बाण थी मै…..मगर आज खुदसे खुद परेशान थी मै…..#RRD(RITESH RAMESH DONGARE)

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11 Comments

  1. babucm 17/11/2016
    • Ritesh Dongare 17/11/2016
  2. Anu Maheshwari 17/11/2016
  3. ANU MAHESHWARI 17/11/2016
    • Ritesh Dongare 17/11/2016
    • Ritesh Dongare 17/11/2016
  4. ketan 17/11/2016
  5. डॉ विजय ढाकरे 17/11/2016
  6. Manjusha 17/11/2016
  7. Ritesh Dongare 18/11/2016

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