मैं….सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

मैंऔरतुम थेमिले जबलम्हें हसीं थेहर रात हसीं थीहर सुबह रंगीन थीफिर ना जाने अमावसकैसे कहाँ से आ गयी किहम हम नहीं रहे तुम तुम नहींदूरियां यूं ही बढ़ती बढ़ती एक दिनहम दोनों में बस अपनी मैं ही रह गयीएक होने को दोनों को अपनी मैं खोनी होगीजो ना अब तुम खो सकती हो और ना मैं ही अबमैंएककला हैमिलने कीअपने आप सेअपने ही प्यार सेजो स्वतः ही आ जातीशर्त यह की दिल एक होंजिस्म की पहचान ख़तम होरूह बनना बनाना दोनों अलगएक रूह बन के बिछड़ सी जाती हैएक बिछड़ के रूह में समा जाती है जबतब सिर्फ मैं ही रहता है वो दिलबर हो या इष्टमैंएककला हैमिलने कीअपने आप सेअपने इष्ट से जोहठ है एक योगी काप्राणों को व्यवस्थित करमन को निग्रह निर्विचार करअपने चक्रों को जागृत करने काऊर्जा को सुष्मना में प्रवाहित करकेआत्मा से साक्षात्कार का समागम कातब यह योगी की ही उद्घोषणा होती हैअहम ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्म हूँ और कोई नहींयह मैं की यात्रा है मूलाधार से सहस्रनार तक कीहठ है योगी का अपनी मैं से अपने इष्ट से मिलने का\/सी. एम्. शर्मा (बब्बू)….

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 09/11/2016
    • babucm 09/11/2016
  2. mani 09/11/2016
    • babucm 09/11/2016
  3. ANU MAHESHWARI 09/11/2016
    • babucm 09/11/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 09/11/2016
    • babucm 09/11/2016
  5. Dr Swati Gupta 09/11/2016
  6. babucm 09/11/2016
  7. MANOJ KUMAR 10/11/2016
  8. babucm 10/11/2016
    • babucm 10/11/2016
  9. Meena Bhardwaj 10/11/2016
    • babucm 11/11/2016

Leave a Reply