खिड़की और इश्क…….मनिंदर सिंह “मनी”

आया सनम मेरा खिड़की में जब,देख उसे भूल गया,खुद को तब,काली जुल्फें लगी चेहरे हो ढकने,कपकपातें से उसके गुलाबी लब,झील सी ऑंखें उसकी देखती मुझे,चेहरे पर ले शरारत, छेड़ती वो मुझे,चाह कहने की बहुत कुछ उसकी,लाज़ शर्म से कुछ कह न पायी मुझे,धीरे धीरे से बंद होने लगी खिड़की,चाह दोनों की बंद हो ना खिड़की, कहीं हो ना जाये बदनाम मुहब्बत,सोचकर उसने बंद कर दी खिड़की,पलो की होती है ये गुफ्तगू हमारी,पलो में ही कर लेते हम बात सारी,बीत गये अब वो हसींन पल प्रेम के,पर आज भी कहे खिड़की बात सारी,

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18 Comments

  1. babucm 07/11/2016
    • mani 07/11/2016
  2. Shishir "Madhukar" 07/11/2016
    • mani 07/11/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 07/11/2016
    • mani 07/11/2016
  4. Dr Swati Gupta 07/11/2016
    • mani 08/11/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 07/11/2016
    • mani 08/11/2016
  6. babucm 08/11/2016
    • mani 08/11/2016
    • mani 08/11/2016
  7. Meena Bhardwaj 08/11/2016
    • mani 09/11/2016
  8. MANOJ KUMAR 10/11/2016
    • mani 10/11/2016

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