नया सवेरा, नयी उमंगें – अनु महेश्वरी

रात का अंधेरा छटने लगा,गगन में छाने लगी, सूरज की लालिमा।पक्षियों ने चहचहाना शुरू किया,नया सवेरा, नयी उमंगें लेकर आया।भोर के उजाले ने,जगाया मुझे नींद से।बाहर निकाल बीते कल से,जगाई नयी आशा दिल में।वो ‘कल’ था, जो बीत गया,वो ‘कल’ होगा, जो आएगा।बीता ‘कल’ लौट के नहीं आता,आनेवाला ‘कल’ का भी नहीं पता।जो अभी है,वो ‘आज’ है,क्यों न हम ‘आज’ में जिए,खुश रहे और खुशियाँ बांटे। “अनु महेश्वरी”चेन्नई

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14 Comments

  1. Dr Swati Gupta 06/11/2016
    • ANU MAHESHWARI 06/11/2016
  2. mani 06/11/2016
    • ANU MAHESHWARI 06/11/2016
  3. Shishir "Madhukar" 06/11/2016
    • ANU MAHESHWARI 06/11/2016
  4. babucm 06/11/2016
    • ANU MAHESHWARI 06/11/2016
  5. निवातियाँ डी. के. 07/11/2016
    • ANU MAHESHWARI 07/11/2016
    • ANU MAHESHWARI 30/11/2016
  6. MANOJ KUMAR 10/11/2016
    • ANU MAHESHWARI 30/11/2016

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