:::  श्यामली  :::

डूबते सूर्य के आगे तुम्हारी उभरती छविविस्तब्ध हैं नजारें जवान होता कवियकायक पक्षियों के कलरवघरौंदों में सपनों के दिये जला दिएदिन भर की तपिश के बादचाँदनी की ठंडक के झरनेसब गिले शिकवे बहा कर ले गईरहा बस तुम्हारा सायाऔर एक रहस्यमयी कशिशआगोश में ले लेती हैमदहोशी भरी वो शख्सियतएक अनबुझी पहेली की तरहमाथे की बिंदी सा सूरजछितिज में फैलाता सुहागन का सिंदूरतुम्हारी लटें डस रहीं हैं सबकोतालाब से नहा कर निकला चाँदआब बिखेर कर चेहरे पर तुम्हारेलटक गया है उस हीरे की तरहजो लगातार उन उरोजों को छूना चाहता हैबादलों की चोली में जोलाली की चुनर ओढ़ेनववधू सी इतरा रही हैतुम्हारी गोद में सोया मेरा सुकूनप्रेम में भीग रहा है धीरे धीरेदूब बनकर ओस की हर बूँद को पी रहारूप जो टपक रहा है निरंतरतेरी आँखों के डोरों ने बाँध रखा हैआशाओं का वो मेरा चाँदजहाँ बसते हैं कबूतर के जोड़ेचुगते रहते हैं जो मेरी नींद कोप्यासी तड़पती रहती हैतेरी अधरों की तरहकंपकंपाते रहते हैंकुछ अनकही को गर्भ में धरेएक सैलाब बन कर आया सन्नाटाजुल्फों को तुमने जो झटका होगातुम्हारे देह की गर्मी से फैलती उमससराबोर कर रही है मुझे पसीने मेंगालों से फिसल कर लबों को चूमते हुए वक्षों को चीरनितम्ब तक उस स्पर्श ने डुबो दिया मुझेएक तितली सी उडती आई सिहरनउत्तेजना ने ली धीरे से अंगड़ाईहर अंग को गुदगुदा रहा हैतुम्हारी शरारती आँखेंजुगनू सी इधर उधर भाग रही हैंमन के खरगोश को ढूंढते हुएमन जो बावला बन चढ़ गयाबबूल की उस ऊंची शाख परजहाँ तनहाई में तुमसे बातें कर सकेसुने प्राण भर कर उस संगीत कोपतंगों की बारात में शामिल हो करमीठी बयार के वो नूतन सुरसाँसों में बसी वो बन्सी की धुनझूम उठी सारी तारों की परियाँसमा गया उन गीतों की बाँहों मेंमुँह छुपा कर वक्ष में दिवानगी मेरीअर्पित कर स्वयं को तुम्हारे शिवाले मेंअमृत-किरण की गंगा निकली फिर दिगंत सेअब एक हैं हम, सम्पूर्ण हुआ मिलन हमारामैं और मेरी श्यामली

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5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/11/2016
    • Uttam Uttam 04/11/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/11/2016
    • Uttam Uttam 05/11/2016

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