::::  स्त्री  ::::

एक कोमल सी कलि बन खिलती है वोसुगंध सी, मिठास सी घुल मिलती है वोमुझे गुमान है अपने मर्दाने अस्तित्व परस्त्री के मजबूत कोख में जो पलती है वोअहसास उसका शक्ति है हर रोम कीगूँजती है अक्षत जैसे रूह हो ओम कीहर चेतना में बसता है स्त्री का रूपविद्या, लक्ष्मी, दुर्गा या मातृ स्वरूपजो स्त्री को मिली कोमल कायासुंदर मधुर चंचल शीतल छायाजिसके कारण आनंद उमंग बरसेसृजना, करुणा, त्याग से मन हर्षजिसके वक्ष से निरंतर प्यार है रिसताप्यार के आँगन में जीवन को सींचताक्यों करे पौरुष से स्त्री की समानताधरती की तुलना जैसे आसमान काशक्ति स्वरूप की पहचान सबको हो ज्ञातसशक्तिकरण स्त्री की है अज्ञानियों सी बातभोग वस्तु कहते असुर, विलासीगंगा से ही बनी है शिव की काशी

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10 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 03/11/2016
    • Uttam 03/11/2016
  2. mani 03/11/2016
    • Uttam 04/11/2016
  3. babucm 03/11/2016
    • Uttam 04/11/2016
  4. Shishir "Madhukar" 04/11/2016
    • Uttam 04/11/2016
  5. MANOJ KUMAR 04/11/2016

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