इस दिवाली क्या तुमने

शीर्षक-इस दिवाली क्या तुमनेइस दिवाली क्या तुमनेएक दीपक जलायाउस कमरे मेंजहाँ रौशनी पहुँचती नहींइस दिवाली क्या तुमनेएक रंगोली बनायीं उस चौखट परजहाँ रंगों ने रंग भरा ही नहींइस दिवाली क्या तुमनेपहनाये कपडे उन जिस्मो पेजिन्हें कपडे नसीब ही नहींइस दिवाली क्या तुमनेकुछ मीठा खिलायाउन सबकोजिन्हें दो जून की रोटी मिलती ही नहींइस दिवाली क्या तुमनेअपने अन्दर जिन्दा रखा उन्हेंजो सरहदों पे तुम्हारे लिए सोते ही नहींऔर अगर सो जाएँ गर हमेशा के लिएतो तुम सो ना सकोगेइस दिवाली एक दीपक जला कर देखोउनके लिएरोशनी तेरे घर में बिखरेंगीमिठास तेरे जीवन में होगी–Abhishek Rajhans

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