दीपक की लौ

कैसे मना लूँ ये दिवाली ,मेरे घर लगा है ,दीपक का मेला ,तो उस घर है ,आँशुओ का बसेरा ,निभा दिया उसने अपना हर वादा  ,अपनी आखरी साँस तक सरहद पर लड़ा ,सांसे उखड़ रही थी ,आँखे बंद हुई जा रही थी ,जूनून था बस दुश्मन से हर न मानना,आया इस दिवाली वो अपने घर ,तिरंगे मे लिपटकर ,बस वो चुप था ,चेहरे पर वही तेज़ था ,माँ अब अपना ख़ुद से ख्याल रखना  ,हर दिवाली पर ,पूरा घर हमेशा की तरह रोशन करना ,माँ मे रहुगा हमेशा तेरे पास ,दीपक की इस लौ मे जलकर …

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 10/05/2017
  2. डी. के. निवातिया 10/05/2017
  3. MANOJ KUMAR 10/05/2017
  4. arun kumar jha 10/05/2017
  5. ANU MAHESHWARI 10/05/2017
  6. Kajalsoni 11/05/2017
  7. babucm 11/05/2017

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